❤️श्री राधा मदनगोपाल❤️

 
❤️श्री राधा मदनगोपाल❤️
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मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल । मंगल मूरति सहचरी, मंगलमय सब काल ।। मंगलमय सब काल, अमंगल मूल नसावन । मंगल मोद बिनोद, महल मंगल मन भावन ।। कहैं, सुनै, अनुमोद करै, पावै बर मंगल ।। - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी (03) इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य सहचरी (श्रीहरिदासजी) भी मंगल की मूर्ति है । यहाँ जिस काल की व्याप्ति है, वह भी मंगल स्वरूप ही है । (दिन, रात, संध्या, प्रभात, क्षण, पल, युग, कल्प आदि के रूप में जिस काल का उल्लेख वाणियों में हुआ है, वह उस काल खंड का वाचक न होकर उस समय के लीला सुख या लीला रस का बोधक है ।) यह मंगल स्वरूप काल समस्त अमंगलों को जड़ मूल से नष्ट करने वाला है । इस नित्यबिहार के आनंद विनोद मंगल स्वरूप है, मनोहर महल भी मंगल स्वरूप है और रसिकन भी मंगल स्वरूप है । इन सब मंगलस्वरूप का सुयश सर्वोपरि मंगल है । जो लोग इन परम मंगलों को कहते हैं, अथवा सुनते हैं, अथवा इनका अनुमोदन करते हैं, वे चरम मंगल की प्राप्ति कर लेते हैं । “Mangal Murti Ladili, Mangal Murti Laal” In the current verse, Shri Bhagwat Rasik explains that everything in his ‘Rasopasna’ is the embodiment of Auspiciousness. He says, “In Nikunj palace, Shri Radha is the embodiment of Auspiciousness and Shri Krishn is the embodiment of Auspiciousness. “Mangal Murti SahcharI, Mangalmay Sab Kaal” ‘Sehchari’ (Shri Radha’s sakhis) are the embodiment of Auspiciousness and every moment here is auspicious. “Mangalmay Sab Kaal, Amangal Mool Nasaavan” Because every moment is auspicious, so due to that it makes no room for any kind of inauspiciousness (or it destroys all the inauspiciousness from its root). “Mangal Mod Binod, Mahal Mangal Man Bhaavan” The sweet and humorous talks are auspicious, the divine Nikunj Mahal (palace) of Shri Radha is the embodiment of Auspiciousness. “Kahain, Sunai, Anumod Karai, Paavai Bar Mangal” The Rasiks are the embodiment of Auspiciousness. Everything about ‘Nitya Vihar’ is Auspicious. The one who speaks, listen, follows ‘Nitya Vihar Upasna’ (Blissful devotion) obtains the ultimate blissful and auspicious nectar. - Shri Bhagwat Rasik, Bhagwat Rasik Ki Vani (03
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